राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक श्री कुप्पहल्ली सीतारामय्या सुदर्शन हिन्दुत्व की एक ऐसी विरासत छोड़ गए हैं, जो सर्वसमावेशी और सशक्त भारत में विश्वास करती है। वह हिन्दू गौरव की पुन: स्थापना के आत्मविश्वासी उद्घोषक थे। योगी श्री अरविन्द के इन वचनों में उनका दृढ़ विश्वास था कि भारत अपनी दैवी नियति को अवश्य प्राप्त करेगा और विश्व की कोई शक्ति भारत को सर्वोच्च एवं सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त करने से रोक नहीं सकती। वह अक्सर कहते थे कि इन दिनों जबकि निराशा और हताशा के काले बादल सबसे ज्यादा गहरे हैं, यही भारत के शीघ्र पुन: उदय का संकेत है। जैसे ऊषाकाल से पहले अंधकार सबसे ज्यादा घना हो जाता है, वैसे ही भारत में पुनरोदय से पहले देश में राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक परिस्थितियां सबसे ज्यादा हताशाजनक रूप से बिगड़ने लगी हैं।
वह जल संरक्षण, पर्यावरण तथा बायोफ्यूल के घोर हिमायती और संरक्षक थे। देशभर के कार्यालयों तथा हर उस घर में जहां सुदर्शन जी जाते, एक अलिखित नियम बन गया था कि किसी भी अतिथि को गिलास में जल पूरा भरकर नहीं दिया जाएगा। उनका कहना था कि अधिकांश जल भरे गिलास व्यर्थ जाते हैं, क्योंकि लोग औपचारिकतावश घूंट-दो-घूंट जल पीते हैं और शेष बचा जल फेंक दिया जाता है। वह समझाते हैं कि जल न केवल पवित्र है बल्कि विश्व में इसकी बहुत कमी है और सम्भवतः अगला विश्व युद्ध जल संकट से ही जन्मेगा।
उन्हें हिन्दी का प्रसार जीवन की आस्था के समान प्रिय था। सरसंघचालक रहते हुए उन्होंने हिन्दी प्रसार के लिए अपने घोर वैचारिक विरोधियों से भी मिलने में संकोच नहीं किया। उस समय हड़कम्प मच गया था जब वह हिन्दी और जल संरक्षण मुद्दे को लेकर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव से मिले और फिर लौटकर दिल्ली में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से भेंट की। उनका कहना था कि अगर हमारा उद्देश्य पवित्र है तो उसे हासिल करने के लिए कोई भी भेंट या मतभिन्नता अथवा प्रोटोकाल का अहंकार आड़े नहीं आना चाहिए।
उनका हिन्दी और संस्कृत ज्ञान श्रेष्ठ विद्वानों को भी अचंभित करता था। जब वह दिल्ली आते तो अक्सर पांचजन्य के पृष्ठों पर हिन्दी की अशुद्धियों पर पेन के निशान लगे और शुद्ध शब्द उनके बगल में लिखे अंक अक्सर हमें देते, संपादकीय स्टाफ को सही हिन्दी बताते और प्रचलन में आ रहे अनेक अशुद्ध हिन्दी शब्दों को ठीक करवाते। उदाहरण के लिए लगभग सभी जगह पुनर्स्थापना शब्द लिखा जाता है, लेकिन सही शब्द है ‘पुनस्स्थापना’। उसी तरह हलंत के बेहद गलत प्रयोगों को उन्होंने रुकवाया। वह समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में अंग्रेजी शब्दों के बढ़ रहे उपयोग के घोर विरोधी थे। उन्होंने पांचजन्य में ‘अच्छी भाषा, अपनी भाषा’ स्तंभ प्रारंभ करवाकर हिन्दी में अंग्रेजी के अस्वीकार्य शब्दों के पर्याय देने का अभियान प्रारंभ किया, जो बहुत लोकप्रिय हुआ। वह एक प्रसिद्ध दैनिक के संपादकीय कार्यालय में जाकर वहां से उस पत्र के पिछले एक महीने की प्रतियां कार्यालय ले आए और फिर उसके संपादकीय विभाग की बैठक लेकर उन्हें बताया कि उनके अखबार में कितनी अशुद्ध हिन्दी का उपयोग हुआ है।
जब हमने सिन्धुदर्शन अभियान प्रारंभ किया तो उसके मुख्य प्रोत्साहकों और संरक्षकों में सुदर्शन जी थे। तब तक उन्हें हृदय रोग के कष्ट का अनुभव हो चुका था। परन्तु वह सिन्धु नदी के दर्शन और पूजन हेतु अत्यंत उत्सुक थे। सो अंततः नागपुर के प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर हर्षवर्द्धन मर्दिकर को उनके साथ भेजा गया ताकि किसी आपातकालीन स्थिति में तुरंत चिकित्सकीय सहायता मिल सके। इस प्रकार उन्होंने सिन्धु पूजन का अनुष्ठान पूरा किया।
आत्मीयता, सरलता और निरहंकारिता के गुण उनकी पहचान थे। घर में आते तो सबकुछ भूलकर बच्चों के साथ बाल सुलभ चर्चा में ही वक्त बिता देते। हल्का भोजन, तनिक आराम और कुछ पारिवारिक फिल्म, टीवी धारावाहिक। उन्हें देखकर कोई ऐसा अनुमान नहीं लगा सकता कि वैश्विक हिन्दू समाज की एक प्रबल वैचारिक धारा को दिशा देने वाले, नियंत्रित करने वाले और भविष्य की पीढ़ी के लिए एक विरासत छोड़कर जाने वाले एक व्यक्ति यहां पर बैठे हैं। उनका विश्वास था कि एक उदारचेता, समर्थ और समृद्ध भारत ही हिन्दुत्व का सर्वश्रेष्ठ परिचय हो सकता है। देश में भुखमरी, कंगाली और अशिक्षा के बीच हम धर्मध्वजा उठाए घूमें, यह बात बेमेल होगी। उन्हें चिंता होती थी कि पूरे दक्षिण एशिया से हिन्दू का पराभव हो रहा है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल और स्वयं भारत में आग्रही हिन्दू हाशिए पर ढकेले गए हैं और हिन्दू मुद्दों का राजनीति में लोप होता जा रहा है, इसका अर्थ यह नहीं कि शेष समाज के प्रति कोई दूसरी निम्न स्तरीय दृष्टि अपनायी जाए।
वह कहते थे कि इस देश का हिन्दू बहुल होना ही शेष मतावलंबियों के लिए सुरक्षा, सम्मान और समान अधिकारों की आवश्यकता है, जिस दिन इस देश में हिन्दू अल्पसंख्यक हो जाएंगे, उस दिन भारत बहुलतावादी भारत नहीं रहेगा, बल्कि पाकिस्तान या बांग्लादेश जैसा बन जाएगा। यह वह बहुत तर्कपूर्ण दृष्टि के साथ विराट मुस्लिम सम्मेलनों में कहते थे और श्रोताओं को समझाकर उनको अपने तर्क से इस तरह संतुष्ट करते थे कि कोई उन्हें मुस्लिम विरोधी नहीं कह पाया। सम्भवतः वह पहले ऐसे हिन्दू नेता थे, जिन्होंने संघ कार्यालय में स्थानीय मौलानाओं और सामान्य मुस्लिमों के साथ ईद मनाई तथा हर साल वे अपने मुस्लिम मित्रों को ईद की बधाई का संदेश भेजते थे। उन्होंने इस्लाम का बड़ा गहरा अध्ययन किया और अजमेर से लेकर नागपुर विश्वविद्यालय तक समकालीन समाज में इस्लाम की भूमिका जैसे विषय पर उनके व्याख्यान हुए, जिनमें अधिकांश श्रोता केवल मुस्लिम थे।
उन्होंने कभी अपने संदेश किसी दूसरे से नहीं लिखवाए। उनकी भाषा की प्रांजलता उतनी ही सुंदर हस्तलिपि में गजब का प्रभाव डालती थी।
किसी पर भी सहज, सरल विश्वास करके मन की बात खोलकर रख देना उनका स्वभाव था, इस कारण कई बार राजनीतिक आपदाएं भी झेलती पड़ीं, पर वह कभी अपने कहे हुए वचन से मुकरे नहीं, आलोचना सही, लेकिन वक्तव्य वापस नहीं लिया।
प्राचीन भारतीय सनातन परम्परा के परमनिष्ठावान अराधक होते हुए नवीन युग तथा समसामायिक परिप्रेक्ष्य के अनुरूप उन्होंने उस हिन्दुत्व के सांचे में करोड़ों हिन्दुओं को ढालने का काम किया, जो हिन्दुत्व विवेकानंद की वाणी और कृतित्व से मुखरित हुआ था। मुझे केवल इस बात का दुख है कि पिछले दो वर्षों से उनके भाषणों और साक्षात्कारों के संकलन का जो प्रयास चल रहा था, वह उनके जीवनकाल में पूरा नहीं हो सका। उनको श्रद्धांजलि एक सशक्त और सर्वसमावेशी बहुलतावादी भारतीय समाज बनाकर ही दी जा सकती है।
तरुण विजय
आदरणीय सुदर्शन जी के प्रति तरुण विजय की ये श्रद्धांजलि उनके फेसबुक ब्लॉग से ली गई है. आप भी उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करना चाहें तो www.rasamkirya.com पर कर सकते हैं. आपके उदगार उनकी स्म्रतियों की भांति सदैव सुरक्षित व संकलित रहेंगे.
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